pragati pari

my world my view my poems

40 Posts

90 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 10910 postid : 596985

हिन्दी से हिंगलिश तक क्या खोया क्या पाया Contest

Posted On: 10 Sep, 2013 Others,social issues,Junction Forum,Contest,Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

हिंदी ब्लॉगिंग ‘हिंग्लिश’ स्वरूप को अपना रही है। क्या यह हिंदी के वास्तविक रंग-ढंग को बिगाड़ेगा या इससे हिंदी को व्यापक स्वीकार्यता मिलेगी? कोस कोस पर बदले पानी चार कोस पर वानी बहुत पुरानी कहावत है किसी गांव मे सुनी थी जिसका मतलब है कि हमारे देश मे इतनी अधिक विभिन्नताये है कि 1कोस दूर जाते ही पानी का स्वाद बदल जाता है और 4 कोस दूर जाते ही वानी यानी की भाषा . ऐसे समाज मे जब हम यह सुनते है कि हमारी मातभाषा खतरे मे है तो सुनकर बहुत अजीब लगता है जैसे ही हिन्दी दिवस पास आने लगता है हर तरफ हिन्दी हिन्दी र्चचा शुरू हो जाती है मानो साल भर हिन्दी को कोई खतरा न हो और हिन्दी दिवस आते ही मुसिबतो का पहाड टूट पडता हो र्चचा, सेमिनार, भाषण सब तरफ हल्ला मचता है और कुछ दिन मे सब कुछ भूलकर वापस अपने काम पर लग जाते है क्या यही है हमारा हिन्दी पेम जो कभी कभी जागता है??? राष्टभाषा का अगर हम सच मे भला चाहते है तो मुक्षे नही लगता कि उसके लिये हमे डरने हल्ला मचाने कि जरूरत है अपनी भाषा से प्यार करो वो अपने आप सुरक्षित रहेगी और तरक्की की राहे चुनेगी कई लोगो का मानना है कि हिगलिश के बडते र्पभाव के कारण हिन्दी को नुकसान हुआ है हिगलिश हिन्दी के लिये खतरा है यह उसके स्वरूप को विर्कत कर रही है। परन्तु मुक्षे ऐसा नही लगता । जब मुगल भारत आये थे उस वक्त भारत मे हिन्दी र्पमुख भाषा थी परन्तू मुगलो की भाषा अरबी फारसी थी। इन भाषाओ के मिलने से एक नयी भाषा उर्दू का विकास हुआ परन्तु उर्दू के विकास के बाद भी हिन्दी का अस्तित्व तो कायम है। ऐसे मे यह सोचना की हिगलिश हिन्दी के लिये बडा खतरा है, मुक्षे नही लगता इसका कोई औचित्य है। जिस तरह हिगलिश हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन रही है ऐसे मे ब्लागिग मे इसका र्वचस्व बठना स्वाभाविक हि है । हिगलिश के कारण युवा वर्ग ब्लागिग से जुडने मे आसानी महसूस करता है क्योकी आज अघिकांश युवाओ को न तो सही रूप से हिन्दी आती है न ही इंगलिश हिगलिश ऐसे युवाओ के लिये अभिव्यक्ति का बेहतर माघ्यम है। ऐसे मे एक पुराना गाना याद आता है। मेरा जुता है जापानी सर पे लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी यह हिन्दुस्तानी दिल ही है जो हमे आपस मे जोङता है । हमारी विभिन्नता मे एकता की संर्स्कती का आघार यही है ।जब तक यह हिन्दुस्तानी दिल है न तो हमारी संर्स्कति न ही हमारी भाषा के लिये कोई खतरा है ।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

12 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
September 14, 2013

जब मुगल भारत आये थे उस वक्त भारत मे हिन्दी र्पमुख भाषा थी परन्तू मुगलो की भाषा अरबी फारसी थी। इन भाषाओ के मिलने से एक नयी भाषा उर्दू का विकास हुआ परन्तु उर्दू के विकास के बाद भी हिन्दी का अस्तित्व तो कायम है। ऐसे मे यह सोचना की हिगलिश हिन्दी के लिये बडा खतरा है, मुक्षे नही लगता इसका कोई औचित्य है। जिस तरह हिगलिश हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन रही है ऐसे मे ब्लागिग मे इसका र्वचस्व बठना स्वाभाविक हि है । हिगलिश के कारण युवा वर्ग ब्लागिग से जुडने मे आसानी महसूस करता है क्योकी आज अघिकांश युवाओ को न तो सही रूप से हिन्दी आती है न ही इंगलिश हिगलिश ऐसे युवाओ के लिये अभिव्यक्ति का बेहतर माघ्यम है। जहां तक प्रगति जी मुझे मालुम है , मुग़ल शाशन में हिंदी नहीं उर्दू ज्यादा प्रचलन में थी ! बढ़िया लेखन

    pragati के द्वारा
    September 14, 2013

    धन्यवाद योगी जी मैने इतिहास मे पङा था कि उर्दू की उत्पत्ति हिन्दी तथा अरबी फारसी के मिलन से हुयी 

Bhagwan Babu के द्वारा
September 14, 2013

बहुत अच्छी कोशिश….

    pragati के द्वारा
    September 14, 2013

    धन्यवाद भगवान जी

jlsingh के द्वारा
September 14, 2013

कोस कोस पर बदले पानी चार कोस पर वानी बहुत पुरानी कहावत है किसी गांव मे सुनी थी जिसका मतलब है कि हमारे देश मे इतनी अधिक विभिन्नताये है कि 1कोस दूर जाते ही पानी का स्वाद बदल जाता है और 4 कोस दूर जाते ही वानी यानी की भाषा . ऐसे समाज मे जब हम यह सुनते है कि हमारी मातभाषा खतरे मे है तो सुनकर बहुत अजीब लगता है जैसे ही हिन्दी दिवस पास आने लगता है हर तरफ हिन्दी हिन्दी र्चचा शुरू हो जाती है मानो साल भर हिन्दी को कोई खतरा न हो और हिन्दी दिवस आते ही मुसिबतो का पहाड टूट पडता हो र्चचा, सेमिनार, भाषण सब तरफ हल्ला मचता है और कुछ दिन मे सब कुछ भूलकर वापस अपने काम पर लग जाते है क्या यही है हमारा हिन्दी पेम जो कभी कभी जागता है???— बहुत सुन्दर विचार!

    pragati के द्वारा
    September 14, 2013

    तारीफ के लिये धन्यवाद

ushataneja के द्वारा
September 13, 2013

यही हिंदी की उदारता का परिचय है कि यह भाषा अन्य भाषाओँ के शब्दों को आत्मसात कर लेती है| सराहनीय लेख प्रगति जी.

    pragati के द्वारा
    September 14, 2013

    धन्यवाद ऊषा जी

Pradeep Kesarwani के द्वारा
September 13, 2013

प्रगति जी खूब कही आपने “कोस कोस पर बदले पानी चार कोस पर वानी” विचारणीय लेख बधाई स्वीकारें…..  

    pragati के द्वारा
    September 14, 2013

    धन्यवाद प्रदीप जी

seemakanwal के द्वारा
September 13, 2013

सुन्दर पोस्ट ,आभार

    pragati के द्वारा
    September 14, 2013

    धन्यवाद


topic of the week



latest from jagran