pragati pari

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pragati


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माओवाद – आखिर किसका विरोध एंव क्यो

Posted On: 2 Dec, 2014  
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Others Politics social issues में

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नारी अबला या शक्ति का स्वरुप ?????

Posted On: 14 Apr, 2014  
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शायरी CONTEST

Posted On: 1 Jan, 2014  
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अच्छी लङकी contest

Posted On: 1 Jan, 2014  
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Contest Others कविता में

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नववर्ष का अटल संकल्प

Posted On: 29 Dec, 2013  
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एक राष्ट्र दो कानुन राष्ट्र का अपमान नही????

Posted On: 3 Dec, 2013  
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एक राष्ट्र दो कानुन राष्ट्र का अपमान नही????

Posted On: 3 Dec, 2013  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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प्रिय प्रगति नाम को सार्थक करता लेख उत्तम लेख तुम्हार भविष्य उज्ज्वल है तुम जैसे पत्रकार चाहिए "जब कुछ पत्रकारों को आतंकी को हीरो बनाते देखा तो सिर शर्म से झुक गया। जब मैं पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही थी तो सीनियर जर्नलिस्टो को देखकर दिल मे एक श्रद्धा जागती थी सोचती थी कब इनके जैसे बन पाएगे। आज उनमें से कुछ के ट्वीट देखकर खुद को मीडिया वाला कहने मे शर्म आती है । एक नामी जर्नलिस्ट का ट्वीट देखा उन्होंने बुरहान की मौत पर जमकर हंगामा किया इनका कहना है कि कश्मीर मे बेरोजगारी की वजह से आतंकवादी हैं अरे जनाब हम भारत नाम के एक विकासशील देश मे रहते हैं जहां कई राज्यों मे बेरोजगारी की समस्या है तो सब आतंकवादी बन जाए। इनसे एक कदम बढ़कर एक ने आतंकवादी की तुलना भगत सिंह से कर दी। अति उत्तम

के द्वारा: Shobha Shobha

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जब मुगल भारत आये थे उस वक्त भारत मे हिन्दी र्पमुख भाषा थी परन्तू मुगलो की भाषा अरबी फारसी थी। इन भाषाओ के मिलने से एक नयी भाषा उर्दू का विकास हुआ परन्तु उर्दू के विकास के बाद भी हिन्दी का अस्तित्व तो कायम है। ऐसे मे यह सोचना की हिगलिश हिन्दी के लिये बडा खतरा है, मुक्षे नही लगता इसका कोई औचित्य है। जिस तरह हिगलिश हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन रही है ऐसे मे ब्लागिग मे इसका र्वचस्व बठना स्वाभाविक हि है । हिगलिश के कारण युवा वर्ग ब्लागिग से जुडने मे आसानी महसूस करता है क्योकी आज अघिकांश युवाओ को न तो सही रूप से हिन्दी आती है न ही इंगलिश हिगलिश ऐसे युवाओ के लिये अभिव्यक्ति का बेहतर माघ्यम है। जहां तक प्रगति जी मुझे मालुम है , मुग़ल शाशन में हिंदी नहीं उर्दू ज्यादा प्रचलन में थी ! बढ़िया लेखन

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Bhagwan Babu Bhagwan Babu

कोस कोस पर बदले पानी चार कोस पर वानी बहुत पुरानी कहावत है किसी गांव मे सुनी थी जिसका मतलब है कि हमारे देश मे इतनी अधिक विभिन्नताये है कि 1कोस दूर जाते ही पानी का स्वाद बदल जाता है और 4 कोस दूर जाते ही वानी यानी की भाषा . ऐसे समाज मे जब हम यह सुनते है कि हमारी मातभाषा खतरे मे है तो सुनकर बहुत अजीब लगता है जैसे ही हिन्दी दिवस पास आने लगता है हर तरफ हिन्दी हिन्दी र्चचा शुरू हो जाती है मानो साल भर हिन्दी को कोई खतरा न हो और हिन्दी दिवस आते ही मुसिबतो का पहाड टूट पडता हो र्चचा, सेमिनार, भाषण सब तरफ हल्ला मचता है और कुछ दिन मे सब कुछ भूलकर वापस अपने काम पर लग जाते है क्या यही है हमारा हिन्दी पेम जो कभी कभी जागता है???--- बहुत सुन्दर विचार!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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